मुझ में बसी हुई थी किसी और की महक, दिल बुझ गयाकि रात वो बरहम नह ीं मिला।

मैं खिल नहीं सका कि मुझे नम नहीं मिला, साक़ी मिरे मिज़ाज का मौसम नहीं मिला।

एक चेहरा जो मेरे ख्वाब सजा देता है, मुझ को मेरे ही ख्यालों में सदा देता है।

वो मेरा कौन है मालूम नहीं है लेकिन, जब भी मिलता है तो पहलू में जगा देता है।

हम समंदर है हमें खामोश रहने दो जरा मचल गए तो शहर ले डूबेंगे

शेरो शायरी कोई खेल नहीं जनाब जल जाती है जवनियाँ लफ्जो की आग में

कई साल से कुछ ख़बर ही नहीं, कहाँ दिन गुज़ारा कहाँ रात की।